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जीवन-यात्रा

मिट्टी से उठी एक आवाज़

माँ को खोने का दुख, गरीबी की मार, ₹75 की दिहाड़ी और लोगों के ताने: इन्हीं से बनी वह ज़िद, जिसने एक मज़दूर के बेटे को लाखों दिलों का भाई बना दिया।

बचपन

जब माँ का आँचल छूटा

हर बड़ी कहानी किसी छोटे-से गाँव से शुरू होती है। यह कहानी शुरू होती है झज्जर ज़िले के गाँव लडरावण (बहादुरगढ़) से, जहाँ 4 सितंबर 1989 को एक साधारण किसान-मज़दूर परिवार में हर्ष का जन्म हुआ। घर में सुविधाएँ कम थीं, पर माँ की ममता हर कमी को ढक लेती थी।

फिर आया 11 फ़रवरी 1997 का वह दिन, जो उस बच्चे की ज़िंदगी का सबसे भारी दिन बन गया। सात बरस की उम्र में माँ का साया सिर से उठ गया। माँ के बाद पिता ही उनकी पूरी दुनिया बन गए: सीधे-सादे, मेहनती इंसान, जो कभी तस्वीर तक नहीं खिंचवाते थे।

जब मैं 7 साल का था, मेरी माँ गुज़री, लेकिन बापू मेरे ने आज तक महसूस नहीं होने दिया। माँ भी मेरी तू, बाप भी मेरा तू।हर्ष छिकारा, अपने पिता के बारे में, जून 2020

महँगाई, कर्ज़ और गरीबी के बीच खेती-योग्य ज़मीन भी कौड़ियों के भाव बिक गई। स्कूल की फ़ीस जुटाना भी मुश्किल था, पर इसी कठिनाई ने उस बच्चे की दृढ़ता को फ़ौलाद बना दिया।

माँ, स्व. सुनीता राठी (1970 – 1997)
माँ, स्व. सुनीता राठी (1970 – 1997)
बचपन की तस्वीर: छोटा-सा हर्ष
बचपन की तस्वीर: छोटा-सा हर्ष
2019: पहली बार बापू के साथ तस्वीर
2019: पहली बार बापू के साथ तस्वीर
दैनिक भास्कर, जून 2023: एक मज़दूर के बेटे का संघर्ष
दैनिक भास्कर, जून 2023: एक मज़दूर के बेटे का संघर्ष
14 बरस, ₹75 की दिहाड़ी

दिन में मज़दूरी, रात में किताबें

जिस उम्र में बच्चे स्कूल का बस्ता उठाते हैं, उस उम्र में हर्ष ने पिता के साथ ट्रकों से रोड़ी-डस्ट उतारी। दिन भर की मेहनत के बदले मिलते थे 75 रुपये।

वो टाइम भी था, मेरा बाप भी मज़दूरी करा करता, और 14 साल की उम्र में साथ में मैं भी रोड़ी-डस्ट के ट्रक खाली करा करता, जब 75 रुपये दिहाड़ी मिला करती। लोगां की गाल भी भतेरी सुनी, पर मन्नै कदे मेहनत करनी ना छोड़ी।हर्ष छिकारा, जून 2023

मैट्रिक गाँव के सरकारी स्कूल से, सीनियर सेकेंडरी बहादुरगढ़ से, फिर स्नातक और एलएल.बी.। राज्य स्तरीय क्रिकेट टीम के लिए खेलते हुए लगभग 10 बार पुरस्कृत हुए। 16 जनवरी 2024 से नाम के साथ जुड़ा “एडवोकेट”।

बीस बरस बाद

जब अख़बार ने छापी एक मज़दूर के बेटे की कहानी

जून 2023 में दैनिक भास्कर ने अपनी वर्षगाँठ पर उनका संघर्ष छापा। फ़रवरी 2024 में हर्ष ने लिखा: “कदे 75 रुपये की मज़दूरी करता था, आज सैकड़ों आदमियों को रोज़गार दे रखा है।”

एक संकल्प

कोई गरीब भूखा न सोए

संघर्ष के दिनों में ही हर्ष ने ठान लिया था कि उनके रहते किसी गरीब को भूखा न सोना पड़े। 2012 में एक छोटी-सी टीम बनाई और शादियों में बचा भोजन इकट्ठा कर गरीब बस्तियों के बच्चों तक पहुँचाना शुरू किया।

दिसंबर 2016 में यूट्यूब चैनल शुरू हुआ और सोशल मीडिया पर लाइव आकर ज़रूरतमंद परिवारों के लिए सीधे मदद माँगने का सिलसिला चला। ताने मिले, आलोचना हुई, पर वे रुके नहीं। आज वही छोटी-सी टीम 1.2 लाख से अधिक ज़मीनी कार्यकर्ताओं का परिवार है।

लोगों ने बहुत गालियाँ दीं, क्यों ड्रामे कर रहा है, क्यों दिखावा कर रहा है… लेकिन हम काम करते रहे।हर्ष छिकारा, दिसंबर 2022

जुलाई 2022 में जब पिता 25 दिन तक अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे थे, तब भी हर्ष समाज के बुलावे पर जगह-जगह पहुँचते रहे; उन्होंने किसी को घर की इस मुश्किल का अहसास तक नहीं होने दिया।

2012: “यहीं से शुरुआत की थी समाज के कामों की”
2012: “यहीं से शुरुआत की थी समाज के कामों की”
16 जनवरी 2024: नाम के साथ जुड़ा “एडवोकेट”
16 जनवरी 2024: नाम के साथ जुड़ा “एडवोकेट”
पहचान

एक नाम नहीं, एक विश्वास

हर धर्म, हर जाति और हर वर्ग को अपनाया; इसीलिए आज सब उन्हें अपना मानते हैं। काम का आधार एक ही रहा: पहले इंसान, फिर बाक़ी सब।

हर जाति, हर धर्म से ऊपर उठकर भी एक चीज़ होती है, उसको बोलते हैं भाईचारा; और छिकारा ने एक ही चीज़ कमाई है, वो है भाईचारा।हर्ष छिकारा, जनवरी 2022

  1. 1₹75 की दिहाड़ी पर ट्रकों से रोड़ी उतारना
  2. 2सात बरस की उम्र में माँ का साया उठा
  3. 3फ़ीस के पैसे तक जुटाना मुश्किल
  4. 4शादियों का बचा भोजन बाँटती छोटी-सी टीम
  5. 5ताने: “दिखावा कर रहा है”
  6. 6न कोई पहचान, न कोई सिफ़ारिश
  1. 1सैकड़ों लोगों को रोज़गार
  2. 2हज़ारों माताओं-बहनों का आशीर्वाद
  3. 3एडवोकेट: एलएल.बी. के बाद क़ानून का पेशा
  4. 41.2 लाख+ ज़मीनी कार्यकर्ताओं का परिवार
  5. 519.2 करोड़+ व्यूज़, हर वीडियो एक मदद
  6. 614,761 मतों का जनादेश (2024)

“अब” दबाकर देखिए, संघर्ष के हर पड़ाव ने क्या बनाया।

सफ़र

1989 से 2026 तक

1989
4 सितंबर को झज्जर ज़िले के गाँव लडरावण (बहादुरगढ़) में एक साधारण किसान-मज़दूर परिवार में जन्म।
1997
11 फ़रवरी को, सात बरस की उम्र में माँ का निधन; पिता ही माँ और पिता, दोनों बने।
14 बरस की उम्र
पिता के साथ ₹75 की दिहाड़ी पर ट्रकों से रोड़ी-डस्ट उतारने की मज़दूरी; साथ में पढ़ाई जारी।
पढ़ाई और खेल
स्नातक और एलएल.बी.; राज्य स्तरीय क्रिकेट में लगभग 10 बार पुरस्कृत।
2012
शादियों के बचे भोजन से भूखे बच्चों की सेवा; जागरूकता वीडियो; जन-लोकपाल आंदोलन में सक्रिय भूमिका।
2016
जाट आरक्षण आंदोलन में शांतिपूर्ण नेतृत्व; दिसंबर में यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया पर लाइव आकर मदद माँगने की शुरुआत।
2018
किसानों के हक़ के लिए महा-किसान आंदोलन का नेतृत्व।
2019
पुलवामा के बाद 40 शहर बंद का अभियान; टप्पल कांड में जंतर-मंतर पर संघर्ष; धारा 35A पर भूख हड़ताल।
2020–21
कोरोना में 5 लाख+ लोगों तक राहत, निःशुल्क ऑक्सीजन सेवा; कृषि क़ानूनों के विरुद्ध आंदोलन और 19 नवंबर 2021 को जीत।
2022
अग्निपथ के विरोध में जींद महापंचायत व तालू से पैदल यात्रा; सांपला और रोहनात महापंचायत।
2023
जंतर-मंतर पर पहलवानों का साथ; मेवात में भाईचारा महापंचायत; बाढ़ में डूबे गाँवों तक पहुँच।
2024
जनवरी में एडवोकेट के रूप में नई पहचान; गोहाना से निर्दलीय चुनाव: केवल ~40 दिन में 14,761 मत।
2025
बेटी मनीषा के लिए न्याय की आवाज़; पंजाब-हरियाणा बाढ़ राहत; HAU छात्रों के लिए महापंचायत।
2026
चानौत (हांसी) के 61 दिन के पेयजल आंदोलन की जीत; पिपली रैली; 1500+ कन्यादान का पड़ाव पार।
जीवनसंगिनी के साथ: “बचपन में हम दोनों के पास फ़ीस के पैसे तक नहीं होते थे”, जुलाई 2023
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बापू, बेटा और पोता: तीन पीढ़ियाँ, 2021
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